Monday, April 12, 2021
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कविता : हुंकार

क्या नहीं यहां कोई मधुसूधन ?
चीत्कार द्रोपदी सुनने को.
बैठा दर-दर पे दुर्योधन,
नग्न द्रोपदी करने को.
भावों की गरिमा चली गयी,
भावों में रावण भाव छुपा.
बैठा दर-दर पे रावण अब,
लाज सिया का हरने को.
कैसे हम अग्नि-परीक्षा दें,
क्या राम यहां पर है कोई?
रावण तो अब दर-दर में है,
क्या राम भाव सा है कोई?
कभी कोख में मार दिया,
कभी मिटाया दुनिया से.
कभी हवस पूरी करके,
तेज़ाब डाल कर जला दिया.
क्या गलत तुम्हारे साथ किया?
नारी ने तो बस त्याग किया.
फिर क्यों तुमने बेरहमी से,
सात्विक भावों को कुचल दिया.
जब सृजन तुम्हारा कर सकते हम,
तो ख़ुद की भी रक्षा करेंगे हम.
अब हर घर से बेटी आयेगी,
‘स्व-पहचान’ बनायेगी.

रश्मि पाण्डेय बिन्दकी, फतेहपुर उत्तर प्रदेश

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