रिपोर्ट- रवीन्द्र त्रिपाठी
फतेहपुर। मलवां विकास खंड के मवइया व उसके आसपास के पांच गांवों की मिठास सहारनपुरी गन्ना बढ़ा रहा है. दीपावली के पहले से ही जूस वाले इस प्रजाति के गन्ने की मांग शुरू हो जाती है दीपावली मे राजस्थान व छठ पूजा में बिहार में यहां के गन्ने की धूम रहती है. इटावा व प्रयागराज के व्यापारी गांव आकर फसल देखकर किसानों से सौदा कर रह है. खेती से आय दूना करने के प्रयासों में सहारनपुरी गन्ना पांच गांवों के आठ सौ किसानों के लिए वरदान साबित हो रहा है.
यूं तो यहां बीस साल पहले से सहरानपुरी गन्ना की खेती शुरू हुई थी. यह गन्ना की ऐसी प्रजाति है जिसमें गुड़ नहीं बनता, पूजा अर्चना के साथ यह गन्ना जूस में प्रयोग होता है. रसीला व कम मिठास वाले इस गन्ने की खेती में किसानों का एक बीघा में खर्च लगभग 15 से 20 हजार का आता है और एक बीघा गन्ना 50 से 70 हजार रुपये में बिकता है. इस तरह से किसान को एक बीघा में लगभग 30 से 40 हजार रुपये की आमदनी हो जाती है. गन्ना की खेती मवइया समेत कोरसम, बांका, कृष्णापुर, नगवापुर के आठ से अधिक किसान कर रहे हैं.
छह माह में तैयार होती फसल :
सहारनपुरी गन्ना की खेती में किसानों को दोहरा लाभ मिलता है. गन्ने की बुआई अप्रैल व मई महीने में होती है और यह गन्ना नवंबर माह में तैयार हो जाता है. खाली खेत में किसान गेहूं व आलू की फसल लेकर दोहरा लाभ कमाते है. इस समय गन्ना की कटाई तेजी के साथ चल रही है. व्यापारी यह गन्ना इटावा, कानपुर, प्रयागराज, बनारस, जालौन, रायबरेली समेत राजस्थान व बिहार में पहुंचा रहे है. कोरोना के कारण पिछले साल गन्ना खेत में ही सूख गया था,. इस साल जूस के साथ छठ पूजा में इस गन्ने की मांग बढ़ी तो रेट भी पिछले साल से प्रति बीघा पांच हजार अधिक मिल रहे है. हरी अवस्थी, मवइया- पहले साल में इस गन्ना में बीस हजार लागत आ जाती है, यदि दूसरे साल भी गन्ना की खेती करनी तो लागत कम हो जाती है. सरकार से यदि बीज में अनुदान मिल जाए तो किसानों को राहत मिलेगी. पवन सिंह, कोरसम- सहारनपुरी गन्ना की खेती में देखरेख में लापरवाही हो गई तो भारी नुकसान उठाना पड़ता है. पत्ती हटाने के साथ चार महीने की पौध होने के बाद दोनों तरफ मिट्टी चढ़ानी पड़ती है. महेश द्विवेदी, कोरसम- गन्ना की खेती का क्षेत्रफल बढ़ता ही जा रहा है, सरकार को चाहिए कि गन्ना की खेती किसानों के लिए और अधिक लाभकारी हो इसके लिए प्रजाति में और सुधार होना चाहिए किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाए.

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