अस्थमा जागरुकता माहः अंडरडायग्नोसिस एवं इलाज में लापरवाही से बढ़ रहा अस्थमा का प्रकोप

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रिपोर्ट- रंजीत रावत

—-भारत में 30 मिलियन लोग अस्थमा का शिकार,70 फीसद लोगों का नहीं हो पाता है सही निदान

लखनऊ,13मई। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिज़ीज़ (जीबीडी) अध्ययन के मुताबिक भारत में 30 मिलियन से ज्यादा लोग अस्थमा का शिकार हैं, जो पूरे विश्व में अस्थमा के भार के 13.09 प्रतिशत के बराबर है। जबकि अस्थमा से होने वाली मौतों के मामले में भारत का योगदान 42 प्रतिशत से ज्यादा है। रुग्णता और मृत्यु का प्रमुख कारण होने के बाद भी सालों तक इस बीमारी का निदान एवं इलाज नहीं कराया जाता है। दुनिया में आबादियों पर आधारित अध्ययनों के मुताबिक अस्थमा के 20 से 70 प्रतिशत मरीजों का निदान नहीं हो पाता है और वो इलाज से वंचित रह जाते हैं।
अस्थमा का निदान एवं इलाज अनेक कारणों से नहीं हो पाता है, जिनमें बीमारी की जागरुकता कम होना, इन्हेलेशन थेरेपी का पालन न करना, अज्ञानता, गरीबी और सामाजिक कलंक शामिल हैं। मरीज शुरुआती लक्षणों को नजरंदाज कर जाते हैं, जिससे उनकी स्थिति और ज्यादा गंभीर हो जाती है। ग्लोबल अस्थमा नेटवर्क (जीएएन) अध्ययन के अनुसार भारत में शुरुआती लक्षणों वाले 82 फीसदी और गंभीर अस्थमा वाले 70 फीसदी मरीजों का निदान नहीं हो पाता है। श्रेष्ठ इलाज नियमबद्धता से करवाने वाले मरीजों की संख्या भी बहुत कम है और प्रतिदिन इन्हेलेशन थेरेपी 2.5 प्रतिशत से भी कम मरीज लेते हैं।
अस्थमा को आम जनता ‘श्वास’, ‘दमा’, या ‘खांसी और जुकाम’ के नाम से भी जानती है। यह सांस की एक लंबी बीमारी है, जिसमें सांस लेने में तकलीफ, छाती में दर्द, खांसी, और सांस लेने में घरघराहट होती है। इस बीमारी से फेफड़ों में मौजूद वायुनलिकाएं प्रभावित होती हैं, जिससे उनमें दीर्घकालिक सूजन आ जाती है, और उत्तेजकों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाती हैं, जिससे अस्थमा का दौरा पड़ने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
ग्लोबल अस्थमा नेटवर्क (जीएएन) अध्ययन का उल्लेख करते हुए, डॉ. राहुल राठौर, पल्मोनोलॉजिस्ट, चरक हॉस्पिटल, ने अस्थमा से जुड़े सामाजिक कलंक को दूर किए जाने के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा, ‘‘जब अस्थमा का मरीज डॉक्टर से संपर्क करता है, तो केवल 71 प्रतिशत डॉक्टर ही उसकी बीमारी को अस्थमा का नाम देते हैं, जबकि अन्य एक तिहाई डॉक्टर (29 प्रतिशत) इस बीमारी को किसी और नाम से बुलाते हैं। मरीजों के मामले में भी अस्थमा के केवल 23 प्रतिशत मरीज ही अपनी बीमारी को अस्थमा कहकर बुलाते हैं। अस्थमा से जुड़ा सामाजिक कलंक और इन्हेलर्स का उपयोग पूरे समाज में विस्तृत रूप से व्याप्त है। इसके अलावा, मरीज दवाईयों को नियमित रूप से नहीं लेता और जब उसके लक्षण प्रकट होते हैं, तभी दवाईयों का सेवन करता है। अस्थमा से जीतने के लिए जागरुकता, अस्थमा को स्वीकार किया जाना और अस्थमा के इलाज का नियम से पालन करना बहुत जरूरी है।’’
डॉ. राहुल राठौर, ने बताया, ‘‘अस्थमा को एक कलंक माना जाता है, और कई मरीज इस बीमारी को छिपाया करते हैं। मरीज डॉक्टर के पास तभी जाता है, जब उसके लक्षण गंभीर हो जाते हैं और उन्हें सहन कर पाना मुश्किल हो जाता है, और उसके बाद ही वह लिखी गई दवाई लेना शुरू करता है। हमें मरीज को समझाना होगा कि लक्षण प्रकट न होने का मतलब यह नहीं कि मरीज को अस्थमा नहीं। अस्थमा के इलाज में यह सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। कई मरीज, जैसे ही बेहतर महसूस करना शुरू करते हैं, वो इन्हेलर का इस्तेमाल बंद कर देते हैं। इन्हेलर बंद कर देने से लक्षण और गंभीर बनकर प्रकट होते हैं, जिससे बीमारी और ज्यादा बिगड़ सकती है। साथ ही इन्हेलर नुकसानदायक होते हैं और इनकी लत पड़ जाती है, इस तरह की गलत धारणाएं इलाज का नियम से पालन करने में आने वाली बड़ी बाधाएं हैं। इस समस्याओं का सख्ती से समाधान किया जाना बहुत जरूरी है।’’
मरीज को जरूरी है कि वह फिज़िशियन से समय पर परामर्श ले, ताकि उसे सही जानकारी मिल सके और उसके लक्षणों का निदान हो सके, जिससे समय पर सही इलाज शुरू हो। अस्थमा के इलाज के लिए समय पर निदान बहुत जरूरी है। अपने अस्थमा के लक्षणों को समझें और अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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