रिपोर्ट- रवीन्द्र त्रिपाठी
फतेहपुर। मिट्टी के हुनरमंदों के लिए जहां आधुनिकता की होड़ में प्रचलित फ्रिज जैसे यांत्रिकी संसाधनों ने ग्रहण लगाया वहीं सकोरा मुंडा का स्थान थर्मोकोल व प्लास्टिक से बने गिलास व प्लेटो ने ले लिया. दीपावली में दियालियो का चलन भी कम होने उसकी जगह मोमबत्ती व इलेक्ट्रॉनिक झालरों के ले लेने से मिट्टी के हुनरमंद प्रजापति (कुम्भकार) समुदाय के सामने रोजी-रोटी की समस्या पैदा कर दिया है. कोरोना संक्रमण के चलते गर्मी में मिट्टी के शिल्पी कुंभकारों का कारोबार कुछ ज्यादा प्रभावित रहा है. ठंडे पानी के लिए मटके और सुराही की बिक्री बाजार बंदी की वजह से न के बराबर हुई. अब उन्हें दशहरा पर्व के बाद  करवाचौथ पर करवे व दीपावली में दियों की बिक्री भी प्रभावित दिख रही है इससे कुंभकारों में मायूसी स्पष्ट रूप से देखी जा रही  है. डिस्पोजल क्राकरी के प्रचलन ने मिट्टी से बने बर्तनों का कारोबार पहले से ही समाप्त कर दिया है और फिर अब कोरोना संक्रमण ने तो उत्सवों पर बिकने वाले मिट्टी के खिलौने और बर्तन की बिक्री भी प्रभावित कर दी है. अप्रैल से मिट्टी के बने सुराही और मटकों की बिक्री शुरू हो जाती है. लोग ठंडे पानी के लिए इसका प्रयोग करते हैं लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण के चलते इसकी बिक्री प्रभावित रही. कुंभकारों के यहां स्टाक लगा रहा अब कुंभकारों को पर्वों से भी उम्मीद नजर नहीं आ रही है. दशहरा पर्व पर टेसू-झांझी की बिक्री गत वर्षों के सापेक्ष 40 फीसद भी नहीं हुई है जिससे उनकी मेहनत का मूल्य भी नहीं मिल पाया. करवाचौथ पर करवे और दीपावली पर दीपकों की बिक्री को लेकर भी वह आशंकित हैं इन पर भी आधुनिकता का साया मंडरा रहा है.

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